डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्र प्रथम की विचारधारा के अमर पुरोधा : भूपेन्द्र सिंह
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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्र प्रथम की विचारधारा के अमर पुरोधा : भूपेन्द्र सिंह
सागर उदय, सागर
पूर्व गृहमंत्री, वरिष्ठ विधायक भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि 6 जुलाई भारतीय जनमानस के लिए केवल डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती का अवसर नहीं है, बल्कि उस राष्ट्रवादी चिंतन को स्मरण करने का दिवस है जिसने स्वतंत्र भारत की वैचारिक दिशा को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ऐसे युगदृष्टा थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सर्वोच्च साधन माना। उन्होंने अपने संपूर्ण सार्वजनिक जीवन में यह सिद्ध किया कि व्यक्ति से बड़ा राष्ट्र होता है, सत्ता से बड़े सिद्धांत होते हैं और राजनीतिक सफलता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्वाभिमान होता है। उनका जीवन भारतीय लोकतंत्र, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकात्मता और अखंड भारत के संकल्प का प्रेरक अध्याय है। उन्होंने कहा कि आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. मुखर्जी के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। भारतीय जनता पार्टी जिस राष्ट्र प्रथम की विचारधारा को लेकर आगे बढ़ रही है, उसकी वैचारिक आधारशिला डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही रखी थी।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का स्पष्ट विश्वास था कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित हुई एक सांस्कृतिक चेतना, साझा सभ्यता और राष्ट्रीय आत्मा का प्रतीक है। भारत की विविध भाषाएँ, परंपराएँ, आस्थाएँ और जीवन पद्धतियाँ उसकी शक्ति हैं, किंतु इन सबके केंद्र में एक अखंड राष्ट्रीय पहचान होना अनिवार्य है। उनका मानना था कि यदि राष्ट्र की एकता और अखंडता कमजोर होती है तो लोकतंत्र भी स्थायी रूप से मजबूत नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने सदैव राष्ट्रहित को दलगत राजनीति से ऊपर रखा और ऐसी व्यवस्था का समर्थन किया जिसमें प्रत्येक नागरिक स्वयं को सबसे पहले भारतीय मानने का गौरव अनुभव करे। उन्होंने कहा कि यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आज एक भारत-श्रेष्ठ भारत की अवधारणा का सशक्त आधार बन चुका है और विकसित भारत के निर्माण की मूल प्रेरणा भी इसी राष्ट्रीय दृष्टि से प्राप्त होती है।
उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी की राजनीति का मूल मंत्र राष्ट्र प्रथम था। उनके लिए राजनीति सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा और जनकल्याण का दायित्व थी। उन्होंने कभी पद, प्रतिष्ठा अथवा राजनीतिक सुविधा को अपने सिद्धांतों से ऊपर नहीं रखा। जब उन्हें लगा कि कुछ नीतियाँ राष्ट्रीय हित के अनुरूप नहीं हैं, तब उन्होंने सत्ता का मोह त्यागकर सिद्धांतों का मार्ग चुना। उन्होंने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता परिवर्तन में नहीं, बल्कि सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने में होती है। उन्होंने कहा कि आज भारतीय जनता पार्टी जिस राष्ट्रवादी राजनीति, सुशासन, जनसेवा और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि की बात करती है, उसकी वैचारिक प्रेरणा डॉ. मुखर्जी के जीवन से ही प्राप्त होती है।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद डॉ. मुखर्जी ने अनुभव किया कि देश को एक ऐसे वैचारिक राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता है जो राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनसेवा को अपना आधार बनाए। इसी सोच के साथ भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। जनसंघ ने भारतीय राजनीति को वैचारिक दिशा दी और आगे चलकर यही विचारधारा भारतीय जनता पार्टी के रूप में देश का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक जनआंदोलन बनी। उन्होंने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय एकता, सुशासन, आत्मनिर्भर भारत, गरीब कल्याण, सांस्कृतिक गौरव और विकसित भारत की दिशा में जो कार्य हो रहे हैं, उनमें डॉ. मुखर्जी के विचारों की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। यह राष्ट्रवादी विचारधारा आज भी देश के विकास और सुशासन की आधारशिला बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी तुष्टिकरण की राजनीति के प्रबल विरोधी थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकार धर्म, जाति, भाषा या पंथ के आधार पर अलग-अलग नहीं हो सकते। संविधान के समक्ष प्रत्येक नागरिक समान है और शासन की नीतियाँ भी समान नागरिकता के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने वोट बैंक की राजनीति को राष्ट्रीय एकता के लिए घातक माना तथा समान अधिकार, समान अवसर और समान न्याय की वकालत की। उन्होंने कहा कि आज समान नागरिक संहिता पर देश में जो विमर्श चल रहा है, वह भी उसी व्यापक संवैधानिक और राष्ट्रवादी दृष्टि का विस्तार है, जिसमें संविधान सर्वोपरि है तथा प्रत्येक नागरिक के लिए समान कानून की व्यवस्था लोकतंत्र की मजबूती का आधार मानी जाती है।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का प्रश्न डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सार्वजनिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अध्याय रहा। उनका उद्धोष- एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे – केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि भारत की अखंडता और राष्ट्रीय एकीकरण का उद्घोष था। उनका मानना था कि एक ही राष्ट्र के भीतर अलग संविधान, अलग ध्वज और अलग व्यवस्था राष्ट्रीय एकात्मता की भावना के विपरीत है। इसी विश्वास के साथ उन्होंने बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने का निर्णय लिया। उन्हें गिरफ्तार किया गया और हिरासत के दौरान उनका निधन हो गया। उन्होंने कहा कि उनका बलिदान केवल एक व्यक्ति का बलिदान नहीं था, बल्कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए दिया गया सर्वोच्च त्याग था। आज भी उनका वह संघर्ष प्रत्येक राष्ट्रवादी भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
उन्होंने कहा कि समय ने सिद्ध किया कि डॉ. मुखर्जी की दूरदृष्टि कितनी सटीक थी। 5 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और उससे जुड़े विशेष प्रावधान समाप्त किए गए, तब करोड़ों देशवासियों ने इसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अधूरे संकल्प की पूर्णता के रूप में देखा। आज पूरे देश में एक संविधान, एक तिरंगा और एक समान संवैधानिक व्यवस्था लागू है। जम्मू-कश्मीर विकास, निवेश, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि दशकों पहले जिस राष्ट्रीय एकीकरण की कल्पना डॉ. मुखर्जी ने की थी, आज उसका स्वरूप अधिक स्पष्ट रूप से देश के सामने दिखाई देता है।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन विशेष प्रेरणा का स्रोत है। युवाओं को केवल उनके जीवन का अध्ययन ही नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में भी उतारना चाहिए। राष्ट्र पहले, स्वार्थ बाद मेंय कर्तव्य पहले, अधिकार बाद मेंय सिद्धांत पहले, पद बाद में-यही उनके जीवन का संदेश था। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यदि युवा चरित्र, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति, सेवा, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व को अपने जीवन का आधार बनाएँ, तो भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र बनने की दिशा में और अधिक गति से आगे बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्र के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। विचार समय से बड़े होते हैं और सिद्धांत इतिहास की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं। उनका जीवन भारतीय राजनीति में राष्ट्रनिष्ठा, वैचारिक स्पष्टता, अटूट साहस और अद्वितीय समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि उनकी जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम राष्ट्र की एकता, अखंडता, संविधान की गरिमा, सांस्कृतिक गौरव, समान नागरिकता, सुशासन और विकसित भारत के संकल्प को अपने जीवन का ध्येय बनाएं तथा आने वाली पीढ़ियों तक उस राष्ट्रवादी चेतना को पहुँचाएँ, जिसके लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और विकसित, आत्मनिर्भर, सुरक्षित तथा एकात्म भारत के निर्माण का सबसे बड़ा संकल्प होगा।
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