संयम मनुष्य भव की सबसे बड़ी कमाई, देवता भी तरसते हैं इसके लिए : सचिन शास्त्री

बीना। तरण-तारण दिगंबर जैन चैत्यालय में चल रहे दस लक्षण पर्व के छठवें दिवस उत्तम संयम धर्म के अवसर पर धर्मसभा का आयोजन किया गया। इसमें भैया सचिन शास्त्री ने उत्तम संयम धर्म के आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को आत्मसंयम का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संयम मनुष्य भव की सबसे बड़ी कमाई है और इसके लिए देवता भी तरसते हैं। मनुष्य जीवन की सार्थकता तभी है, जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, इंद्रियों और व्यवहार पर नियंत्रण रखते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़े।

संयमनं संयम: अर्थात स्वयं को संयमित करने का नाम ही संयम है। सामान्य रूप से व्यक्ति संयम को बंधन के रूप में देखता है, लेकिन वास्तव में संयम बंधन नहीं, बल्कि वंदन और अभिनंदन का रूप है। संयम व्यक्ति को उसकी सीमाओं का बोध कराता है और जीवन को अनुशासन प्रदान करता है। जिस प्रकार घोड़े की गति को लगाम नियंत्रित करती है और वाहन की गति को ब्रेक नियंत्रित करता है, उसी प्रकार भोग-विलास की अंधी दौड़ में आगे बढ़ रही जीवन की गाड़ी को संयम रूपी ब्रेक नियंत्रित करता है।

उन्होंने संयम के विभिन्न स्वरूपों को समझाते हुए कहा कि छह काय के जीवों की रक्षा करने का भाव प्राणी संयम कहलाता है। वहीं पांच इंद्रियों और मन के विषयों का त्याग करना इंद्रिय संयम है। मनुष्य जब अपनी इंद्रियों को विषयों के पीछे अनियंत्रित रूप से दौड़ने से रोकता है, तभी उसके भीतर आत्मिक शांति और स्थिरता का भाव विकसित होता है। संयम का उद्देश्य जीवन को कठिन बनाना नहीं, बल्कि उसे मर्यादित, अनुशासित और पवित्र बनाना है

आज संसार में शांति की आवश्यकता है और इसके लिए संयम अत्यंत आवश्यक है। यदि सभी देश संयमित होकर अपनी सीमाओं का पालन करें तो संघर्ष और अशांति को कम किया जा सकता है। इसी प्रकार देश, समाज और परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मयार्दा में रहकर दूसरों की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए। जब व्यक्ति अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं करता और दूसरे के अधिकार एवं सम्मान का ध्यान रखता है, तब परिवार से लेकर समाज तक सुख और शांति का वातावरण निर्मित होता है।

संयम केवल धार्मिक अनुष्ठान का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा होना चाहिए। बोलते समय वाणी पर संयम, व्यवहार में संयम, खान-पान में संयम, इच्छाओं पर संयम और क्रोध सहित अन्य विकारों पर नियंत्रण व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठ बनाता है। मनुष्य अपने मन, वचन और काया की व्यर्थ चेष्टाओं को संयमित कर ले तो वह स्वयं के साथ-साथ दूसरों के लिए भी सुख और शांति का कारण बन सकता है। मन में उठने वाले अनावश्यक विचारों पर नियंत्रण, वाणी का सदुपयोग और शरीर की अनावश्यक गतिविधियों पर संयम व्यक्ति के आचरण को निर्मल बनाता है।

वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में लगातार आगे बढ़ रहा है। इच्छाएं बढ़ती जाती हैं और उनके पीछे भागते हुए व्यक्ति मानसिक अशांति का शिकार हो जाता है। ऐसे समय में संयम जीवन को संतुलित करने का कार्य करता है। आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच अंतर समझना भी संयम का ही एक स्वरूप है।

संयम हमारे व्यावहारिक जीवन के साथ आध्यात्मिक जीवन को भी पवित्र बनाता है। संयम के माध्यम से व्यक्ति अपने कर्मों पर विचार करता है और आत्मा की ओर उन्मुख होता है। यही भाव आगे चलकर मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है। उत्तम संयम धर्म के अवसर पर केवल प्रवचन सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके संदेश को अपने व्यवहार और जीवन में उतारना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार जीवन में संयम धारण करे। छोटी-छोटी बातों से संयम की शुरूआत की जा सकती है। अपनी वाणी, व्यवहार, इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकता है। धर्मसभा के अंत में सभी से संयम को जीवन का हिस्सा बनाकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की मंगल भावना व्यक्त की।

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