नरकों की असहनीय पीडा से बचने धर्म की शरण आना पढेगा :मुनि प्रयोग सागर
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नरकों की असहनीय पीडा से बचने धर्म की शरण आना पढेगा :मुनि प्रयोग सागर
रहली। ब्रह्मांड में अंनत पृथ्वियां है यह बात आज विज्ञान बता रहा है जबकि जैन दर्शन में महान आचार्य उमा स्वामी ने सदियों पूर्व तत्वार्थ सूत्र की रचना की तो उसमें तीनों लोकों का वर्णन विस्तार से किया है 10 लक्षण पर्व में 10 दिन तत्वार्थ सूत्र की वाचना करना अत्यंत आवश्यक है और शुभ माना जाता है इन दिनों हम व्रत उपवास करते हुए स्वयं को धर्म पर लगाते हैं इसी कारण एकाग्रता से सुनने पर हमें सूत्र जी का भाव समझ में आता है.
10 लक्षण पर्व के तीसरे दिन दोपहर में दस श्राविकाओं ने क्रमश: दसों अध्याय का वाचन किया तत्पश्चात मुनि श्री प्रयोग सागर जी ने तीसरे अध्याय की वाचना उपरांत सार समझते हुए बताया जैन भूगोल में आज हम उन सात पृथ्वियों का वर्णन समझेंगे जिन्हें नर्क कहते हैं तीसरे अध्याय के पहले और दूसरे सूत्र में इसका विस्तार से वर्णन है नर्को और नारकीयों का वर्णन भय पैदा करने के लिए नहीं है बल्कि जीव को अनंत दुखों से बचाने के लिए पूज्य उमा स्वामी जी ने किया है सर्वार्थ सिद्धि ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख है कि नरकों में जीव की 33 सागर की आयु होते हुए नरक की सातों पृथ्वियों में से एक पर भी परस्पर प्रेम भाव नहीं होता वहां प्रत्येक जीव का काम एक दूसरे को दुख देने का होता है और यह दुख भरी पीड़ा इतनी भायावह होती है की एक अंगुल शरीर में 96 रोग होते हैं आज एक रोग का अनुभव यदि किया जाए तो 96 रोगों की कल्पना मात्र से शरीर में कपकपी आ जाती है मुनि श्री ने बताया कि नरक की पहली पृथ्वी से पीड़ाओं का दौर शुरू होता है और सातवीं पृथ्वी तक वह दुख बढ़ता ही चला जाता है उसके बाद कृष्ण लेश्याओं का दुख भी भोगना पड़ता है. वहां जीवों की स्थिति यह रहती है पूरे समुद्र भी पी जाए तो भी प्यास ना मिटे पर एक बूंद पानी नहीं मिलता तीनों लोगों का अनाज खा जाए पर भूख नहीं मिट्टी अन्न का एक दाना भी नहीं मिलता एक दूसरे को मार कर खून पीते हैं और खाते हैं ।
यहां तक वर्णन आता है कि जीव तीर्थंकर प्रवृत्ति की सत्ता को लेकर कर्मबंध के कारण नरको में रहते हुए उस पीड़ा को सहन कर रहे हैं वे तीर्थंकर बनेंगे लेकिन पहले अपने कर्मों का फल भोगकर मनुष्य पर्याय प्राप्त कर स्वाध्यायी बनकर मुनी बनकर तीर्थंकर बनेंगे हमारे पूज्य आचार्यों ने सिद्धांत ग्रंथों की रचना की ताकि आने वाले समय में मनुष्य स्वाध्यायी बने और अपने भावों को सुधारे उन्होंने उसमें वर्णन किया अच्छा बनने के लिए कौन से परिणाम उदय में लाना और कौन से परिणाम से बचना चाहिए नियमित स्वाध्याय से धर्म का स्वरूप समझ में आता है जैसे लगातार मथने से दूध में छुपा घृत हमें मिल जाता है उसी प्रकार अपने कर्मों को सुधारने के लिए प्रायश्चित करते हुए शुक्लालेश्या में मन लगे नियमित स्वाध्याय करें व्रत का पालन करें संयम को धारण करें और धर्म क्रियो को करते हुए।
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