त्याग का अर्थ जीवन से भागना नहीं, बल्कि जीवन जीने की दृष्टि को बदलना है : पंडित सचिन शास्त्री

दान पुण्य है, जबकि त्याग धर्म है; राग-द्वेष और मोह का त्याग आत्मकल्याण का मार्ग

बीना। तारण तरण दिगंबर जैन चैत्यालय में चल रहे दस लक्षण पर्व के अंतर्गत बुधवार को उत्तम त्याग धर्म दिवस श्रद्धा और धार्मिक भावनाओं के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए पंडित सचिन शास्त्री ने त्याग धर्म की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि त्यजति इति त्याग: अर्थात जो छोड़ने की भावना रखता है, वही त्याग है। उन्होंने कहा कि वास्तविक त्याग केवल धन, संपत्ति या भौतिक वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है, बल्कि पर वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति मन में उत्पन्न ममत्व एवं आसक्ति का त्याग करना ही सच्चे अर्थों में त्याग धर्म है।

आत्मा का स्वभाव ग्रहण करना या छोड़ना नहीं, बल्कि अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहना है। इसलिए त्याग का वास्तविक उद्देश्य बाहरी वस्तुओं को छोड़ने से अधिक उन वस्तुओं के प्रति बनी आसक्ति और ममत्व की भावना को समाप्त करना है। उन्होंने भावपूर्ण पंक्तियों के माध्यम से कहा—

कौन कहता है, ये धन महल अटारी छोड़ दे।

जो जैसा है वैसा रहने दे, बस इनसे अपनी दृष्टि मोड़ ले।

पंडित सचिन शास्त्री ने कहा कि सामान्य रूप से समाज में दान और त्याग को एक ही अर्थ में देखा जाता है, जबकि दोनों में अंतर है। जगत प्राय: दान को ही त्याग समझ लेता है, लेकिन दान पुण्य है और त्याग धर्म है। दान करने से जीव को पुण्य का बंध होता है और स्वर्ग आदि अच्छी गति की प्राप्ति हो सकती है, जबकि त्याग धर्म आत्मा को राग-द्वेष और मोह से मुक्त करते हुए मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाता है।

 जीव राग के भाव को छोड़कर परोपकार की भावना से औषधि, आहार, ज्ञान और अभय दान करता है अथवा धन-वस्तु आदि का उपयोग दूसरों के हित में करता है, तो यह व्यवहार की दृष्टि से त्याग धर्म कहलाता है। वहीं निश्चय की दृष्टि से त्याग धर्म का संबंध आत्मा के आश्रय से है। आत्मकल्याण के लिए राग, द्वेष, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषाय भावों का त्याग करना आवश्यक है।

त्याग में स्वोपकार की भावना प्रमुख होती है। बाहरी वस्तुओं का त्याग तभी सार्थक है, जब उसके साथ मन के भीतर जमी आसक्ति भी समाप्त हो। व्यक्ति धन-संपत्ति रखते हुए भी उसके प्रति मोह और अहंकार से मुक्त रह सकता है। इसके विपरीत केवल वस्तुओं को छोड़ देने से त्याग की पूर्णता नहीं होती, यदि मन में उनके प्रति आसक्ति बनी हुई है।

मनुष्य को अपने धन और संसाधनों का उपयोग अच्छे कार्यों में करना चाहिए। जीव रक्षा, विद्यालय, पाठशाला, औषधालय, स्वाध्याय, धार्मिक गतिविधियों एवं धर्म प्रभावना जैसे कार्यों में बिना मान-सम्मान की अपेक्षा किए सहयोग करना चाहिए। निस्वार्थ भाव से किया गया सहयोग समाज के साथ-साथ व्यक्ति के आत्मिक विकास में भी सहायक बनता है।

दान का उद्देश्य यश, प्रसिद्धि अथवा प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। दान छपाकर नहीं, छिपाकर करना चाहिए। जब दान के साथ अहंकार जुड़ जाता है तो उसकी धार्मिक भावना कमजोर पड़ जाती है। इसी प्रकार त्याग भी दूसरों को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपने आत्मकल्याण के लिए किया जाना चाहिए।

आज मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने में लगातार प्रयासरत है, लेकिन वास्तविक सुख भीतर की शांति से मिलता है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, आसक्तियों और कषाय भावों पर नियंत्रण करना सीखता है, तभी त्याग धर्म की वास्तविक भावना उसके जीवन में उतरती है।

त्याग जीवन को बनाता है संयमित और सार्थक

पंडित सचिन शास्त्री ने कहा कि त्याग का अर्थ जीवन से भागना नहीं, बल्कि जीवन जीने की दृष्टि को बदलना है। धन, परिवार, संपत्ति और सांसारिक जिम्मेदारियों के बीच रहते हुए भी व्यक्ति उनमें अनावश्यक ममत्व और आसक्ति को कम कर सकता है। यही भावना उसे संयम, संतोष और आत्मचिंतन की ओर ले जाती है।

उत्तम त्याग धर्म के अवसर पर केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग करने का संकल्प न लें, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष और मोह जैसे विकारों को छोड़ने का प्रयास करें। यही त्याग आत्मा को शुद्धता की ओर ले जाने वाला और मोक्षमार्ग को प्रशस्त करने वाला है।

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