मतदाता सूची, संस्थागत जाँच और सार्वजनिक विश्वास

सागर उदय
नईदिल्ली। मतदाता सूची, संस्थागत जाँच और सार्वजनिक विश्वास भारत में भारत निर्वाचन आयोग (एउक) और इसके विशेष गहन पुनरीक्षण (रकफ) पर बहस अब केवल मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों की संख्या तक सीमित नहीं है। यह इस बारे में भी है कि मतदाता सूचियाँ कैसे बनाई जाती हैं, उनकी जाँच और सुधार कैसे किया जाता है और चुनाव पैनल के भीतर निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है। रकफ अभ्यास सटीक मतदाता सूचियों और समावेशी मतदाता पंजीकरण के बीच संतुलन बनाने के महत्व को रेखांकित करता है। बूथ स्तर के अधिकारियों (इछड२) द्वारा घर-घर जाकर जाँच, कमजोर समूहों के लिए विशेष सहायता डेस्क, बूथ स्तर के एजेंटों (इछअ२) से सहायता और आॅनलाइन दस्तावेज जमा करने जैसे उपायों का उद्देश्य इस प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाना है। 24 जून 2025 और अक्टूबर 2026 के बीच 2.37 करोड़ जेन जी (ॠीा े) मतदाताओं के जुड़ने के साथ, यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक पात्र नागरिक पंजीकरण कर सके और अपने विवरण सत्यापित कर सके, चुनावी भागीदारी के केंद्र में बना हुआ है। इसलिए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि रकफ वास्तव में क्या है, इसे क्यों शुरू किया गया और वैध मतदाताओं को बाहर होने से बचाने के लिए क्या सुरक्षा उपाय किए गए हैं।
रकफ क्या है और यह क्यों आवश्यक है?
विशेष गहन पुनरीक्षण (रकफ) मतदाता सूचियों को सत्यापित और अपडेट करने का एक विस्तृत अभ्यास है। नियमित संक्षिप्त पुनरीक्षण के विपरीत, इसमें मौजूदा प्रविष्टियों का गहरा सत्यापन शामिल होता है, जिसमें यह जाँच करना शामिल है कि क्या मतदाता जीवित हैं, बताए गए पते पर सामान्य रूप से निवासी हैं और दोहरा पंजीकरण (४िस्र’्रूं३ी ीा१ङ्म’ेीा३) से मुक्त हैं। इसका कानूनी आधार संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 (3) से आता है, जो एउक को कारणों को दर्ज करते हुए किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण का आदेश देने की अनुमति देता है।
इसकी आवश्यकता इसलिए पड़ती है क्योंकि मतदाता सूचियाँ निरंतर बदलती रहती हैं। लोगों की मृत्यु होती है, वे पलायन करते हैं, निर्वाचन क्षेत्र बदलते हैं और कभी-कभी एक से अधिक बार दिखाई देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फैसले में उल्लेख किया गया कि बिहार में पिछला गहन पुनरीक्षण 2003 में किया गया था, जबकि बीच के दो दशकों में तेजी से शहरीकरण, बड़े पैमाने पर पलायन, मृत्यु की रिपोर्ट न होने और प्रविष्टियों के दोहराव देखा गया। न्यायालय ने माना कि रकफ का उद्देश्य मतदाता सूचियों की सटीकता और अखंडता तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव बनाए रखने से जुड़ा एक वैध उद्देश्य था। बिहार रकफ 24 जून 2025 को शुरू हुआ। एक स्तर पर, 98.01% मतदाताओं को कवर किया गया था, जिसमें 7.17 करोड़ गणना फॉर्म, या कुल का 90.89%, प्राप्त और डिजिटाइज किए गए थे। इस अभ्यास ने लगभग 20 लाख मृत मतदाताओं, 28 लाख स्थायी रूप से पलायन कर चुके मतदाताओं, 7 लाख दोहरे पंजीकरणों, 1 लाख अप्राप्य मतदाताओं और लगभग 15 लाख बिना लौटे फॉर्मों की पहचान की। ये आंकड़े बताते हैं कि क्यों एक चुनावी डेटाबेस को समय-समय पर गहन जाँच की आवश्यकता होती है। लेकिन सटीकता के साथ-साथ समावेशिता भी होनी चाहिए।
यह प्रक्रिया मतदाताओं की रक्षा कैसे करती है?
एउक ने बिहार और पश्चिम बंगाल सहित 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रकफ पूरा किया, और शेष 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चरण ॥ शुरू किया। अनमैपिंग या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस प्राप्त करने वाले मतदाताओं के लिए, बूथ स्तर के अधिकारी (इछड२) घर-घर जाकर जाँच करते हैं, दस्तावेज एकत्र करते हैं और उन्हें एउकठी३ पर अपलोड करते हैं, जिससे एफड या अएफड कार्यालयों में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सुनवाई यथासंभव आॅनलाइन आयोजित की जाती है, और मतदाता अपने प्रतिनिधित्व के लिए परिवार के किसी भी वयस्क सदस्य को अधिकृत कर सकते हैं। जिला निर्वाचन अधिकारियों ने मजदूरों, रैन बसेरा निवासियों और गरीब नागरिकों के लिए सहायता डेस्क और विशेष शिविर स्थापित किए हैं। गोवा में, इछड आउटरीच ने पहचाने गए 97 छूटे हुए मतदाताओं में से 81 को फॉर्म 6 जमा करने और अपना पंजीकरण बहाल करने में मदद की। क्षेत्रीय भागीदारी का पैमाना भी महत्वपूर्ण है। बिहार ने 77,895 मौजूदा इछडर, 20,603 नवनियुक्त इछडर और बुजुर्गों, दिव्यांगों और कमजोर नागरिकों की सहायता करने वाले 4 लाख से अधिक स्वयंसेवकों को तैनात किया। मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने मतदाता सूचियों के समानांतर सत्यापन के लिए लगभग 1.56 लाख बूथ स्तर के एजेंटों (इछअ२) की नियुक्ति की। देशभर में, 20 लाख से अधिक इछअर पंजीकरण प्रक्रिया का आॅडिट करते हैं, जबकि चुनाव के दिन मतदान केंद्रों पर 100% वेबकास्टिंग की जाती है। 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक ड्राफ्ट विलोपन (१िा३ ीि’ी३्रङ्मा२) का आंकड़ा विवाद का केंद्र बन गया है। लेकिन ड्राफ्ट विलोपन में मृत, पलायन कर चुके, दोहरे और असत्यापित प्रविष्टियों जैसी श्रेणियां शामिल हैं। इसलिए, ड्राफ्ट विलोपन स्वचालित रूप से मताधिकार छीनने के समान नहीं है।
प्रक्रिया, युवा पंजीकरण और न्यायालय का नया प्रश्न
रकफ की समयसीमा में 24 जून 2025 का प्रारंभिक आदेश, 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 27 अक्टूबर 2025 का कार्यक्रम और 19 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 14 मई 2026 का कार्यक्रम शामिल था। एउक ने कहा था कि इन आदेशों पर तीनों चुनाव आयुक्तों ने सर्वसम्मति से सहमति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट की 26 मई 2026 और 27 मई 2026 की कार्यवाहियों ने बिहार रकफ ढांचे के कानूनी आधार को बरकरार रखा। साथ ही, 24 जून 2025 और अक्टूबर 2026 के बीच, 2.37 करोड़ जेन जी (ॠीो) मतदाता जोड़े गए-लगभग 16 लाख हर महीने, या 50,000 हर दिन। दिल्ली में दावा और आपत्ति की समयसीमा 30 अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दी गई, जिसका निपटान 30 नवंबर 2026 तक किया जाना था, और महाराष्ट्र में 12 अक्टूबर 2026 तक, जिसका निपटान 10 नवंबर 2026 तक किया जाना था।

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