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हम अपनी इच्छाओं का कल्पवृक्ष, साहित्य के भाव से ही प्राप्त कर सकते हैं : डॉ. बारेलाल जैन

सागर उदय संवाददाता, सागर

साहित्य हमें संवेदना, करुणा, दया का भाव, समता और समरसता में बने रहने की प्रेरणा देता है। ऐसा लगता है जैसे साहित्य की यात्रा भेद से अभेद की है, बीज से वट वृक्ष बनने की है, अज्ञान से ज्ञान की यात्रा है, और सत् साहित्य पढ़ते हुए साहित्य का स्वाध्याय करते हुए जो आत्म संयम प्राप्त होता है जो संतोष प्राप्त होता है जो श्रम की पूंजी मिलती है उसकी गरिमा हमें साहित्यिक जीवन से ही प्राप्त होती है। हम अपनी इच्छाओं का कल्पवृक्ष इस साहित्य के भाव से ही प्राप्त कर सकते हैं जब हमें साहित्य का भाव प्राप्त हो जाता है तो कहां सम्राट, कहां शहंशाह, हमें सब फीके लगने लगते है। हम संतोष प्राप्त करने लगते हैं कोई भी धन हो हमें लोभ से नहीं भर पाता। यह बात रीवा से डॉ बारेलाल जैन ‘लाल’ ने कही, वह बुंदेलखंड हिंदी साहित्य संस्कृति विकास मंच सागर की शनिवार को आयोजित साप्ताहिक 1659 वीं संगोष्ठी और आॅनलाइन 337 वीं संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे।

रायसेन से श्रीमती चित्रा चतुवेर्दी ने संगोष्ठी का संचालन किया। सागर से डॉ नलिन निर्मल जैन ने भक्ति-भाव से माँ सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की। इसके पूर्व अपने स्वागत भाषण में सागर से पूरन सिंह राजपूत ने स्वागत की परंपरा का निर्वाह करते हुए समस्त साहित्य मनीषियों का स्वागत करते हुए कहा कि  कीरती भनती मूरती भलसोई और सुर सरी सम सबके हित होई अर्थात आपकी प्रसिद्धि आपका सृजन, आपका व्यक्तित्व बहुत उत्तम है और यह गंगा जी के समान सबके हित में होना चाहिए और है भी, मैं ऐसा मानता हूं। उन्होंने काव्य गोष्ठी के अंत में समस्त उपस्थितों का आभार भी व्यक्त किया।

इस गोष्ठी में काव्य पाठ हेतु दमोह से डॉ प्रेमलता नीलम, रीवा से डॉ प्रतिभा दुबे आश्वी, पृथ्वीपुर से कल्याण दास साहू पोषक, नागपुर से श्रीमती मंजूषा किंजवाडेकर, बड़ा मलहरा से डॉ. देवदत्त द्विवेदी सरस, सागर से साहित्य मनीषीगण डॉ सीताराम श्रीवास्तव भावुक, डॉ नलिन निर्मल जैन, डॉ श्याम मनोहर सिरोठिया ने काव्यपाठ किया। संगोष्ठी में उपस्थित साहित्य मनीषी व प्रबुद्धजनों में सागर के सम्माननीय साहित्य-मनीषी एल.एन.चौरसिया, वीरेंद्र त्रिपाठी, कृष्णकांत बख्शी, राजेन्द्र चतुवेर्दी टीकमगढ़, संतोष श्रीवास्तव विद्यार्थी, अजय सराफ, उमाकांत मिश्र श्यामलम, योगेश दत्त तिवारी आदि उपस्थित रहे और कवियों का उत्साह वर्धन किया।

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